बिहार : विधानसभा चुनाव से पहले ही ममता बनर्जी की पार्टी अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुट गई है. ममता की पार्टी के लिए 21 जुलाई का दिन बेहद खास है और माना जा रहा है कि इस अहम दिन के साथ ही पार्टी अपनी चुनावी बिगुल बजा सकती है. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का 32वां शहीद दिवस है. अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल पार्टी की 21 जुलाई को होने वाली यह आखिरी महारैली है. महारैली में ममता बनर्जी मुख्य वक्ता तो होंगी ही, साथ में भतीजे अभिषेक बनर्जी भी होंगे. इनके अलावा इस महारैली में अन्य राज्यों में मजबूत राज्यस्तरीय दलों के नेता भी शामिल हो सकते हैं.
1 लाख लोगों की जुटेगी भीड़
कहा जा रहा है कि समाजवादी पार्टी से पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल से तेजस्वी यादव और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस से उमर अब्दुल्ला भी महारैली में शामिल हो सकते हैं. इस अवसर पर धर्मतला में हो रही महारैली में 1 लाख से ज्यादा लोगों के जुटने की उम्मीद है.
रैली से पहले कोर्ट पहुंचा मामला
21 जुलाई यानी तृणमूल कांग्रेस के लिए शहीदी दिवस, यह दिन पार्टी के लिए बेहद खास दिन होता है. अब कोर्ट के एक फैसले के बाद इस बार का आयोजन (शहीद दिवस रैली) बेहद अहम हो गया है. हर साल की तरह इस बार भी तृणमूल कांग्रेस ने कोलकाता के मध्य में स्थित धर्मतला में शहीदी दिवस पर विशाल आयोजन की योजना बनाई थी. लेकिन आयोजन को लेकर मामला कलकत्ता हाईकोर्ट चला गया.
ममता ने किया विपक्ष पर वार
आयोजन स्थल को लेकर कोर्ट की टिप्पणी के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विपक्ष का नाम लिए बगैर आरोप लगाया कि विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस के शहीद दिवस (21 जुलाई) को नाकाम करने की कोशिश कर रहे हैं. धर्मतला तृणमूल कांग्रेस के लिए बेहद खास इसलिए है क्योंकि यहीं पर प्रदर्शन के दौरान पार्टी के कई कार्यकर्ता जमीन पर गिरे और फिर कभी उठ नहीं सके. ममता का कहना है कि यह इलाका रक्तरंजित है, इसीलिए यहां पर शहीद दिवस रैली आयोजित की गई.
फोटो वोटर आईडी कार्ड के लिए प्रदर्शन
आखिर 21 जुलाई को हुआ क्या था और यह दिन ममता तथा उनकी तृणमूल कांग्रेस के लिए जरूरी क्यों है. बात 1993 की है तब तृणमूल कांग्रेस का गठन नहीं हुआ था और ममता बनर्जी कांग्रेस में थीं. ममता तब 38 साल की युवा नेता थीं, और फायर ब्रांड नेता के रूप में उनकी छवि बन गई थी. पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में ममता खेल मंत्री थीं. लेकिन खेल से जुड़ी नीतियों को लेकर राव सरकार से मतभेद के चलते उन्होंने मंत्री पद छोड़ दिया.
हालांकि ममता बंगाल कांग्रेस में बनी हुई थीं और वह प्रदेश युवा कांग्रेस की अध्यक्ष थीं. साल 1991 में पश्चिम बंगाल में हुए चुनाव में कम्युनिस्ट लेफ्ट फ्रंट फिर से बड़ी बहुमत के साथ सत्ता में लौटने में कामयाब रही. ज्योति बसु फिर से मुख्यमंत्री बने. लेकिन यह चुनाव विवादों में रही. विपक्ष ने चुनाव में धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए. यही आरोप धीरे-धीरे पूरे बंगाल में आंदोलन का रूप में लेने लग गया.